असम में यूसीसी: महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा या चुनावी राजनीति का नया अध्याय?

हाल ही में असम की राजनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला जब भारतीय जनता पार्टी ने राज्य में लगातार तीसरी बार सत्ता हासिल की और मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में दूसरी बार सरकार बनी।

इन चुनावों की सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि बीजेपी की तेज राजनीतिक लहर में विपक्ष लगभग पूरी तरह बिखर गया।

चुनाव प्रचार के दौरान बीजेपी ने अपने घोषणापत्र में यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) लागू करने का वादा किया था। अब जब पार्टी पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में है, तो सरकार ने विधानसभा में यूसीसी विधेयक पेश कर दिया है।

सरकार इसे महिलाओं के अधिकारों, सामाजिक सुधार और पारदर्शिता से जोड़ रही है, जबकि विपक्ष इसे राजनीतिक ध्रुवीकरण और वैचारिक एजेंडे का हिस्सा बता रहा है।

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है की क्या यह वास्तव में “समान नागरिक संहिता” है या फिर समाज और राजनीति दोनों को नए तरीके से प्रभावित करने वाला कदम?

आखिर क्या है असम का यूसीसी विधेयक?

असम सरकार द्वारा पेश किए गए इस प्रस्तावित कानून का उद्देश्य विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, बहुविवाह और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे मामलों को एक समान कानूनी ढांचे में लाना है।

इस विधेयक के कुछ प्रमुख प्रावधान इस प्रकार हैं:

  • सभी विवाह और तलाक का अनिवार्य पंजीकरण
  • बहुविवाह पर रोक
  • लिव-इन रिलेशनशिप का रजिस्ट्रेशन आवश्यक
  • विवाह के लिए समान न्यूनतम आयु
  • महिलाओं और बच्चों के अधिकारों को कानूनी सुरक्षा
  • संपत्ति और उत्तराधिकार में अधिकार सुनिश्चित करने का प्रयास

सरकार का दावा है कि इससे धोखाधड़ी, शोषण और रिश्तों में कानूनी अस्पष्टता कम होगी।

उत्तराखंड और गुजरात का संदर्भ क्यों महत्वपूर्ण है?

असम यूसीसी लागू करने वाला पहला राज्य नहीं है। इससे पहले उत्तराखंड और गुजरात भी इस दिशा में कदम बढ़ा चुके हैं।

उत्तराखंड ने यूसीसी को एक बड़े सामाजिक सुधार के रूप में प्रस्तुत किया था। वहाँ सरकार ने विशेषज्ञ समिति बनाई, विभिन्न समुदायों से सुझाव लिए और लंबे विमर्श के बाद कानून का ढांचा तैयार किया। गुजरात में भी समान नागरिक संहिता को लेकर राजनीतिक और सामाजिक चर्चा लंबे समय तक चली।

असम का मामला थोड़ा अलग माना जा रहा है, क्योंकि यहाँ पूर्वोत्तर की जनजातीय संरचना, मुस्लिम आबादी और क्षेत्रीय पहचान की राजनीति पहले से बेहद संवेदनशील विषय रही है।

यही वजह है कि इस कानून को केवल कानूनी बदलाव नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है।

Assam UCC Debate

क्या यूसीसी सच में महिलाओं को मजबूत करेगा?

हमारी राय में यूसीसी का सबसे मजबूत पक्ष महिलाओं के अधिकारों से जुड़ा हुआ दिखाई देता है।

अगर विवाह का पंजीकरण अनिवार्य होता है, तो:

  • महिलाओं को कानूनी पहचान मिलेगी
  • तलाक या अलगाव की स्थिति में अधिकार सुरक्षित होंगे
  • बहुविवाह जैसी प्रथाओं पर रोक लगेगी
  • बच्चों के अधिकार स्पष्ट होंगे
  • संपत्ति और विरासत में महिलाओं की स्थिति मजबूत हो सकती है

लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी ढांचे में लाने का उद्देश्य भी इसी दिशा में देखा जा रहा है। आज कई मामलों में रिश्ते टूटने के बाद महिलाओं के पास कानूनी सुरक्षा नहीं होती। ऐसे में रजिस्ट्रेशन व्यवस्था उन्हें कुछ हद तक सुरक्षा दे सकती है।

लेकिन विवाद क्यों हो रहा है?

यहीं से बहस का दूसरा पक्ष शुरू होता है क्योंकि कई लोगों का मानना है कि अगर इसे “समान” नागरिक संहिता कहा जा रहा है, तो फिर कुछ समुदायों और जनजातीय समूहों को इससे बाहर क्यों रखा गया है? आलोचकों का कहना है कि इससे “एक देश, एक कानून” की अवधारणा कमजोर पड़ती है।

हमारी राय में यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पूर्वोत्तर राज्यों में जनजातीय परंपराएँ और सांस्कृतिक पहचान बेहद संवेदनशील विषय हैं। सरकार शायद सामाजिक टकराव से बचने के लिए उन्हें फिलहाल बाहर रखना चाहती है, लेकिन इससे यूसीसी की मूल अवधारणा पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

क्या यह कानून समाज में सकारात्मक बदलाव ला सकता है?

संभव है कि यह कानून कुछ स्तरों पर सकारात्मक बदलाव लाए:

संभावित सकारात्मक प्रभाव

  • महिलाओं की कानूनी सुरक्षा मजबूत होगी
  • बाल विवाह और बहुविवाह पर नियंत्रण बढ़ेगा
  • रिश्तों में कानूनी स्पष्टता आएगी
  • संपत्ति और उत्तराधिकार के मामलों में पारदर्शिता बढ़ेगी
  • फर्जी विवाह और धोखाधड़ी के मामलों में कमी आ सकती है

अगर सही तरीके से लागू किया गया, तो यह सामाजिक सुधार की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकता है।

समाज पर नकारात्मक असर की आशंका क्यों जताई जा रही है?

दूसरी तरफ कई लोग इसे सामाजिक तनाव बढ़ाने वाला कदम भी मान रहे हैं।

संभावित नकारात्मक प्रभाव

  • धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को लेकर असुरक्षा बढ़ सकती है
  • अल्पसंख्यक समुदायों में राजनीतिक अविश्वास पैदा हो सकता है
  • “राज्य बनाम समुदाय” जैसी मानसिकता विकसित हो सकती है
  • निजी जीवन में सरकारी हस्तक्षेप बढ़ने की बहस तेज़ हो सकती है
  • लिव-इन रिश्तों के पंजीकरण को लेकर युवाओं और सामाजिक समूहों में विवाद हो सकता है

हमारी राय में सबसे बड़ी चुनौती कानून बनाना नहीं, बल्कि उसे सामाजिक सहमति के साथ लागू करना होगी। अगर संवाद की कमी रही, तो यह कानून सामाजिक सुधार से अधिक राजनीतिक विवाद का विषय बन सकता है।

Assam UCC Debate

क्या यूसीसी अब राष्ट्रीय राजनीति का बड़ा मुद्दा बनने जा रहा है?

बीजेपी लंबे समय से यूसीसी को अपने वैचारिक एजेंडे का हिस्सा बताती रही है। ऐसे में असम, उत्तराखंड और गुजरात जैसे राज्यों में इसकी पहल को केवल राज्य स्तरीय कानून नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीतिक संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है।

2026 के विधानसभा चुनावों से पहले इसलिए ही असम में यह मुद्दा राजनीतिक विमर्श के केंद्र में रहा। एक तरफ सरकार इसे महिलाओं और सामाजिक न्याय से जोड़ रही है, वहीं विपक्ष इसे ध्रुवीकरण की राजनीति बता रहा है।

चतुर्थ का दृष्टिकोण 

हमारी राय में असम का यूसीसी केवल एक कानूनी बदलाव नहीं, बल्कि आने वाले समय की राजनीति और सामाजिक संरचना, दोनों की दिशा तय करने वाला कदम साबित हो सकता है।

एक तरफ यह महिलाओं के अधिकार, वैवाहिक पारदर्शिता और सामाजिक सुधार की दिशा में मजबूत पहल दिखाई देती है, वहीं दूसरी तरफ इसके लागू होने का तरीका और कुछ समुदायों को इससे बाहर रखना बहस को और गहरा करता है।

अगर सरकार इस कानून को संवाद, विश्वास और समानता की भावना के साथ लागू करती है, तो यह सामाजिक सुधार का मॉडल बन सकता है। लेकिन अगर यह केवल राजनीतिक ध्रुवीकरण का माध्यम बनकर रह गया, तो समाज में विभाजन और अविश्वास भी बढ़ सकता है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है की क्या UCC वास्तव में “समानता” का कानून बनेगा या फिर भारतीय राजनीति का अगला बड़ा वैचारिक मुद्दा?

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